निर्माणाधीन संस्थाएं
आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व, आचार्य कुंदकुंद देव ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप साम्यभाव के आश्रम की उद्घोषणा की थी, जिसका ना तो कोई निर्माण था और न ही कोई अधिष्ठाता । वह तो आत्मा की ही निर्मल पर्यायों से बना हुआ एक आनंदमय निकेतन था । भगवान महावीर से लेकर आचार्य कुंदकुंद और उनसे लेकर वर्तमान के समस्त ज्ञानियों तक मोक्षमार्ग की, अर्थात् परस्पर में भगवान देखते हुए भगवान बनने की, जो संस्कृति अनवरत चली आई है, उसी धारा में आ. बाल ब्र. पंडित श्री सुमतप्रकाश जी ने “आ. श्री कुंदकुंद साधना वसदि, सम्मेदशिखर” की परिकल्पना की है ।